संग्रहालय का इतिहास

भारतीय संग्रहालय का इतिहास

१८१४ - २०२२

भारतीय संग्रहालय, कोलकाता

भारतीय संग्रहालय का उद्भव और विकास भारत की विरासत और संस्कृति के विकास में एक अभूतपूर्व घटना है। १८१४ में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल  (वर्तमान में १ पार्क स्ट्रीट पर स्थित एशियाटिक सोसाइटी की इमारत) द्वारा स्थापित भारतीय संग्रहालय सबसे पहला और केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही नहीं बल्कि विश्व के एशिया प्रशांत क्षेत्र का सबसे बड़ा बहुप्रयोजन संग्रहालय है। यह आंदोलन, जो १८१४ में शुरू हुआ वास्तव में देश के सामाजिक सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए एक महत्वपूर्ण युग की शुरुआत थी। इसके अतिरिक्त, इसे आधुनिकता का प्रारंभ तथा मध्यकालीन युग का अंत भी माना जाता है।

१८१४ में भारतीय संग्रहालय की स्थापना ने भारत में संग्रहालय स्थापित करने का प्रचलन शुरू किया और इन वर्षों में इस आंदोलन ने उत्साह और गति को पकड़े रखा। इसकी भव्य प्रगति हुई जो देश के ४००  से अधिक संग्रहालयों के लाभदायक अस्तित्व में परिणत हुई है।

भारतीय संग्रहालय के उद्भव और विकास के इतिहास के महत्व को समझने के लिए हमें १८वीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश पर नज़र डालनी होगी जब एक प्रकांड विद्वान, सर विलियम जोंस ने अपना जीवन भारत की सेवा में समर्पित किया और कोलकाता में १७८४ में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की।

एशियाटिक सोसाइटी की भूमिका सामाजिक- सांस्कृतिक गतिविधियों से संबंधित कला और संस्कृति के विकास के लिए शिक्षण केंद्र का गठन करना था, जो लोगों का मनोरंजन करने के साथ-साथ लोगों को ज्ञान प्रदान करने और सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक विरासत को एशिया की भौगोलिक सीमाओं में आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवित रखते।

लेकिन एशियाटिक सोसाइटी के संस्थापक सर विलियम जोंस ने अपने उद्घाटन भाषण में सोसाइटी के क्रियाकलापों में संग्रहालय की स्थापना का उल्लेख नहीं किया है।

१७९६ में एशियाटिक सोसाइटी के सदस्यों ने ऐसी वस्तुओं के ग्रहण और उनके संरक्षण के लिए एक उपयुक्त स्थान पर एक संग्रहालय स्थापित करने का विचार रखा जो कि मनुष्य द्वारा बनाई गई हों या प्रकृति द्वारा उत्पन्न हो।

इस विचार को १८०८ की शुरुआत में अस्तित्व मिला जब सोसाइटी ने पार्क स्ट्रीट के कोने पर सरकार द्वारा दी गई भूमि पर अपना परिसर स्थापित किया।

छः साल बाद एक संग्रहालय की स्थापना के इरादे के कार्यन्वयन के लिए एक निश्चित प्रयास किया गया जब डॉक्टर नथानियेल वॉलिच – एक डेनिश वनस्पति शास्त्री जिन्हें हुगली के श्रीरामपुर की घेराबंदी के दौरान बंदी बनाया गया लेकिन उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों के सम्मान में सरकार द्वारा मानित कर आज़ाद किया गया – ने सोसाइटी को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होने एक संग्रहालय के गठन की प्रबल वकालत की और प्रस्तावित संग्रहालय के मानद संग्रहाध्यक्ष के रूप में कार्य करने के साथ-साथ अपने स्वयं के बहुमूल्य संग्रहों से प्रतिकृतियों भी देने का सोसाइटी के समक्ष प्रस्ताव रखा।

इस प्रस्ताव को सोसाइटी के सदस्यों का तत्काल अनुमोदन प्राप्त हुआ और एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के परिसर में इस सामाजिक संग्रहालय को स्थापित करना तय किया गया।

इस प्रकार एशियाटिक सोसाइटी के परिसर में २ फरवरी १८१४ को डॉक्टर नथानियेल वॉलीच के मार्गदर्शन में एक संग्रहालय स्थापित किया गया। उन्हें ओरिएंटल म्यूज़ियम ऑफ द एशियाटिक सोसाइटी (एशियाटिक सोसाइटी के प्राच्य संग्रहालय) के मानद संग्रहाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया।

देश के विभिन्न भागों से रोचक तथा अद्भुत वस्तुओं को इकट्ठा किया गया था।

वर्ष १८१६ में २७ यूरोपीय दानदाताओं द्वारा १७४ वस्तुएं उपहार के रूप में संग्रहालय को दी गई। दान करने वालों में व्यक्तिगत संग्रहकर्ता कर्नल स्टूवर्ट,  डॉ टाइट्लर, जेनरल मैकेंजी, श्री ब्रायन होडग्सो कैप्टन गिलों थे।

भारतीय योगदानकर्ता ने भी संग्रहालय को वस्तुएं उपहार के रूप में देना शुरू कर दिया। सूची में से उन ४९ दाताओं में से ६ दाता थे बाबू राम कमल सेन, काली किशन बहादुर, महाराजा राधाकांत देब, मथुरानाथ मल्लिक, शिवचंद्र दास और महारानी बेगम समरु।

१८३७ में समाज के सचिव जेम्स प्रिंसेप ने सरकार को राज्य की लागत पर राष्ट्रीय संग्रहालय के निर्माण के प्रस्ताव को पारित करने के लिए लिखा।

डॉ हेल्फर और अन्य वैज्ञानिक अधिकारियों ने कलकत्ता में आर्थिक भूविज्ञान का एक संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय किया। यह संग्रहालय वास्तव में १८४० में खोला गया। आर्थिक भू विज्ञान संग्रहालय सोसाइटी के परिसर पर १८५६ तक बना रहा जब भारतीय सरकार ने अपने संग्रह को हटाकर १, हेस्टिंग स्ट्रीट में भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण में रख दिया।

१८५६ में सोसाइटी के सदस्यों  ने कलकत्ता में एक इम्पीरियल म्यूज़ियम (शाही संग्रहालय) की स्थापना के लिए भारत सरकार को एक निवेदन पत्र प्रस्तुत करने का निर्णय किया। २ साल बाद भारत सरकार को अभिवेदन प्रस्तुत किया गया जिसमें सोसाइटी ने कलकत्ता में एक इम्पीरियल म्यूज़ियम स्थापित करने के लिए दबाव डाला।

भारत सरकार ने प्राकृतिक इतिहास, भौतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक, आदि के नमूनों के संग्रह और प्रदर्शनी के लिए  महानगर में  इम्पीरियल म्यूज़ियम को स्थापित करने के अपने कर्तव्य को माना।

१८५८ में भूवैज्ञानिक संग्रहालय को भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के साथ सम्मिलित किया गया।

१८६२ में भारतीय सरकार ने कलकत्ता में एक सार्वजनिक संग्रहालय पर विचार करने और अस्तित्व में बदलने के लिए नींव रखने की घोषणा की।

वर्ष १८६५ के मध्य तक भारत सरकार और एशियाटिक सोसाइटी के बीच दीर्घ वार्ताएं हुई और यह निर्णय लिया गया कि सोसाइटी को प्राणीविज्ञान, भूवैज्ञानिक और पुरातत्व संग्रह के प्रस्तावित संग्रहालय के लिए बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ का गठन कर उन्हें सौंप देना चाहिए और इस संबंध में भारत सरकार संग्रहालय की इमारत में सोसाइटी के लिए एक उपयुक्त आवास प्रदान करेगी।

बाद में यह महसूस किया गया कि नियोजित इमारत में संभवत भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय के अलावा एशियाटिक सोसाइटी के लिए जगह की कमी हो जाएगी। सोसाइटी ने भी ऐसी इमारत में प्रवेश करने की अनिच्छा व्यक्त की, जहां जगह अपर्याप्त थी और काम करने की स्वतंत्रता में मुश्किले आती। 

इस प्रकार १८६७ में भारतीय संग्रहालय के वर्तमान भवन की नीव लघु वाद न्यायालय के सामने चौरंगी के उत्कृष्ट स्थल पर रखी गई। १८७५ में डब्ल्यू  एल ग्रैंडविल द्वारा डिजाइन किए गए चौरंगी में वर्तमान संग्रहालय की इमारत पूरी की गई।१८१४ से १८७८ तक यह संग्रहालय कोलकाता में पार्क स्ट्रीट के एशियाटिक सोसाइटी की इमारत में था।
चौरंगी मार्ग पर नए भवन का निर्माण के पूरा होने के बाद, सामाजिक संग्रहालय को एशियाटिक सोसाइटी से वर्तमान भवन में स्थानांतरित कर दिया गया और इसे १ अप्रैल १८७८ में दो दीर्घाओं के साथ जनता के लिए खोल दिया गया था।

प्राणी खंड के पुरातत्व दीर्घा और पक्षी दीर्घा को वर्तमान भवन में जनता के लिए खुला घोषित किया गया।

यद्यपि शुरुआत में भारतीय संग्रहालय को दो दीर्घाओं के साथ खोला गया था , बाद में इसे बहुद्देशीय संस्थान में बदल दिया गया था जहां इसके छः खंडों में बहु- विषयक वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया, जो हैं –  कला ,पुरातत्व, मनुष्य जाति का विज्ञान, जीव –विज्ञान ,भू विज्ञान और वनस्पति विज्ञान।

संग्रहालय जिसे शुरुआत में “एशियाटिक सोसाइटी म्यूज़ियम” के नाम से जाना जाता था बाद में “इम्पीरियल म्यूज़ियम” के रूप में जाना जाने लगा और फिर “भारतीय संग्रहालय” के नाम से इसे पहचान प्राप्त हुई। यह संग्रहालय आगंतुकों के बीच जादूघर या अजायबघर के नाम से अधिक जाना जाता है।

एशियाटिक म्यूज़ियम के समय से ही यह संस्थान भारत की जनता को भारत की कला और संस्कृति के प्रतीक के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान करता आ रहा है।

भारतीय संग्रहालय की भूमिका संग्रहालय और समाज के बीच सामाजिक-सांस्कृतिक सद्भाव को दर्शाती है। 

इसके परिणामस्वरूप यह संग्रहालय देश के अपने प्रकार के सबसे बड़े संस्थानों के रूप में विकसित हुआ है जो राष्ट्र की विरासत और गौरव को चित्रित कर रहा है और इसे भारत गणराज्य के संविधान के एक अग्रणी राष्ट्रीय संस्थान के रूप में भी महत्व दिया जा रहा है।

संग्रहालय निदेशालय में कला ,पुरातत्व और मानव विज्ञान नामक तीन मुख्य सांस्कृतिक खंड हैं और साथ ही संरक्षण, प्रकाशन ,फोटोग्राफी ,प्रस्तुति, मॉडलिंग ,शिक्षा, पुस्तकालय और सुरक्षा जैसी आठ सह – सेवा इकाइयां शामिल हैं।

संग्रहालय की अपनी चिकित्सा इकाई है जो संगठन के सभी कर्मचारियों को प्रारंभिक चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराती है।

सांस्कृतिक खंडों जैसे कि – कला ,पुरातत्व और मानव विज्ञान सहित अन्य समन्वित इकाइयों/वर्गो का प्रशासनिक नियंत्रण, भारतीय संग्रहालय के निदेशालय कार्यालय के तहत बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ करते है।

यह संस्थान भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन है

संग्रहालय के बारे में

1814 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल (वर्तमान में 1 पार्क स्ट्रीट पर स्थित एशियाटिक सोसाइटी की इमारत) द्वारा स्थापित भारतीय संग्रहालय सबसे पहला और केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही नहीं बल्कि विश्व के एशिया प्रशांत क्षेत्र का सबसे बड़ा बहुप्रयोजन संग्रहालय है।

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