भरहुत दीर्घा

भरहुत दीर्घा

यह दीर्घा वास्तुशिल्प अवशेष दर्शाती है- यहाँ मध्य प्रदेश के सतना जिले में भरहुत नामक स्थान से प्राप्त रेलिंग और “तोरण” के नाम से जाना जाने वाला एकमात्र बचा हुआ पूर्वी प्रवेश द्वार है। यह अवशेष शुंग काल के हैं जिन्हें सर एलिक्सैन्डर कनिंघम ने १८७३ में खुदाई में निकाला। बालुकाश्म से उकेरी गई नक्काशी दर्शाती हैं –

जातक कहानियाँ

भगवान बुद्ध के जीवन की कहानियाँ

वनस्पति, पशु (असली और शानदार) और ज्यामितीय रूपांकन

गंधर्व और देवियाँ – यक्ष और यक्षिणी, देवता, 

नाग और नागिन जैसे लोकप्रिय लोक देवता। भरहुत के अवशेषों के बगल में, बोधगया से प्राप्त रेलिंग के कुछ अवशेष हैं (जिनमें से कुछ प्रतियाँ है तो कुछ असली हैं) जो कि पहली शताब्दी ईसापूर्व के समय के हैं। यह रेलिंग उस बोधि वृक्ष के चारों ओर लगी थी जिस वृक्ष के नीचे बैठ कर भगवान बुद्ध को बोध (ज्ञान) प्राप्त हुआ।

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संग्रहालय का संग्रह

संग्रहालय के बारे में

1814 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल (वर्तमान में 1 पार्क स्ट्रीट पर स्थित एशियाटिक सोसाइटी की इमारत) द्वारा स्थापित भारतीय संग्रहालय सबसे पहला और केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही नहीं बल्कि विश्व के एशिया प्रशांत क्षेत्र का सबसे बड़ा बहुप्रयोजन संग्रहालय है।

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